नालागढ़। नालागढ़ उपमंडल के पहाड़ी हल्के रामशहर के बड्डू के साथ रवा खान गांव का एक और वीर सैनिक देश के लिए शहीद हो गया। असम राइफल्स में हवलदार के रूप में 32 वर्षों तक देश की सेवा करने वाले सोमदत्त ने अपनी अंतिम सांस अस्पताल में ली, जहां 16 घंटे तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद उन्होंने प्राण त्याग दिए। उनकी शहादत पर असम राइफल्स, स्थानीय पुलिस प्रशासन, और गणमान्य व्यक्तियों ने राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी है।
सोमदत्त की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उनकी यूनिट से अस्पताल तक पहुंचने में 11 घंटे का समय लगा। इस दौरान उनकी हालत गंभीर हो गई थी। नागालैंड के समातूल में तैनात सोमदत्त पिछले कुछ समय से बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन उनकी मेहनत और कर्तव्यनिष्ठा ने उन्हें हमेशा ड्यूटी पर डटे रहने के लिए प्रेरित किया। असम राइफल्स के जवान राजेश यादव ने बताया कि सोमदत्त एक कर्मठ और मेहनती सैनिक थे, जिन्होंने हमेशा अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से किया।
सोमदत्त का परिवार देश सेवा की अनूठी मिसाल है। उनके परिवार के आठ सदस्य सेना में भर्ती रहे हैं, जिनमें से तीन पहले ही रिटायर हो चुके हैं, और अब सोमदत्त की ऑन-ड्यूटी मृत्यु ने परिवार को गहरा झटका दिया है। वह तीन वर्ष बाद रिटायर होने वाले थे। उनके परिवार में अब उनकी पत्नी, एक बेटा, और एक बेटी बचे हैं। उनकी बेटी निजी अस्पताल में कार्यरत है, जबकि बेटा और पत्नी आर्थिक रूप से परिवार के एकमात्र कमाने वाले सोमदत्त पर निर्भर थे
सोमदत्त की पत्नी के भतीजे नीरज ठाकुर ने बताया कि परिवार इस दुख की घड़ी में टूट चुका है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि सोमदत्त के बेटे को उनकी जगह नौकरी दी जाए, ताकि छोटे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके। नीरज ने कहा, "हमारे परिवार ने देश के लिए बहुत कुछ दिया है। अब सरकार को हमारे बच्चों के भविष्य की चिंता करनी चाहिए।"
पूर्व सैनिक अध्यक्ष शिवलाल वर्मा ने सोमदत्त की शहादत को देश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा, "सोमदत्त के परिवार ने देश को आठ सैनिक दिए, जिनमें से चार ने अपनी पूरी जिंदगी देश सेवा में समर्पित की। उनकी शहादत पर हमें दुख भी है और गर्व भी।" असम राइफल्स की टीम ने उनके पैतृक शहर नालागढ़ में उनके पार्थिव शरीर को लाकर श्रद्धांजलि अर्पित की और सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया।
स्थानीय समुदाय और सैनिक संगठनों ने भी सोमदत्त को याद करते हुए उनकी वीरता और बलिदान की सराहना की। उनके अंतिम संस्कार के दौरान लोगों की भीड़ उमड़ी और हर आंख नम थी। सोमदत्त की शहादत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि देश के सैनिक न केवल सीमा पर बल्कि हर परिस्थिति में अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार रहते हैं।
सोमदत्त की स्मृति में उनके गांव में एक स्मारक बनाने की मांग भी उठ रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें। केंद्र और राज्य सरकार से परिवार की मांग है कि उनकी सेवाओं के सम्मान में उनके बच्चों के लिए उचित प्रावधान किए जाएं।


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