नालागढ़। नालागढ़ उपमंडल के आदूवाल नदी और महादेव खड् के आसपास खनन माफिया के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे सरकारी जमीन पर बिना किसी डर के अवैध खनन कर रहे हैं। पिछले एक सप्ताह से जेसीबी मशीनों और टिप्परों की मदद से बेखौफ तरीके से खनन का यह गोरखधंधा चल रहा है, जिससे प्रदेश की कीमती खनिज संपदा की लूट हो रही है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस माफिया ने न केवल करोड़ों रुपये की खनिज सामग्री चुराई है, बल्कि पर्यावरण, नदी तटों और स्थानीय समुदाय को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है। महादेव गांव के पास सरकारी जमीन पर हो रहे इस अवैध खनन ने ग्रामीणों को आक्रोशित कर दिया है। खनन माफिया ने 20-20 फीट गहरे गड्ढे खोदकर नदी के प्राकृतिक प्रवाह को खतरे में डाल दिया है।
ग्रामीण रामपाल ने बताया, "पिछले एक सप्ताह से हम खनन विभाग, पुलिस और एसडीएम कार्यालय में शिकायतें कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। माफिया ने बच्चों के कब्रिस्तान को भी नहीं बख्शा और उसे जेसीबी से उजाड़ दिया। आसपास के पेड़-पौधों को भी नष्ट कर दिया गया है, जिससे पर्यावरण को भारी क्षति हुई है। "ग्रामीणों का कहना है कि कुछ स्थानीय युवा इस माफिया के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे यह अवैध कारोबार और बेरोकटोक चल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर प्रशासन पहले ही सतर्क होता, तो इतना बड़ा नुकसान नहीं होता। रामपाल ने सवाल उठाया, "जब हम रात को शिकायत करते हैं, तो कोई क्यों नहीं आता? क्या माफिया इतना ताकतवर है कि प्रशासन उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता?"
कुलदीप शर्मा, एक अन्य स्थानीय निवासी, ने बताया, "रात के अंधेरे में जेसीबी और टिप्परों से खनन किया जा रहा है। करीब 20-25 बीघा सरकारी जमीन को नष्ट कर दिया गया है। नदी का रुख अब गांव और मंदिर की ओर मुड़ सकता है, जिससे बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। पेयजल स्रोत सूख रहे हैं, और आने वाले समय में इसका खामियाजा पूरे गांव को भुगतना पड़ सकता है।"
शनिवार सुबह ग्रामीणों का गुस्सा उस समय और भड़क गया जब उन्होंने एकजुट होकर खनन स्थल पर विरोध प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने बताया कि शुक्रवार रात को उन्होंने पुलिस और खनन विभाग को शिकायत दी थी, लेकिन कोई भी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। सुबह जब ग्रामीणों ने खनन स्थल पर पहुंचकर हंगामा किया और मीडिया की मौजूदगी बढ़ी, तब जाकर खनन विभाग की टीम हरकत में आई।
माइनिंग इंस्पेक्टर चंद्र वर्मा ने बताया, "हमें शिकायत मिलते ही सुबह 6 बजे मौके पर पहुंच गए थे। ग्रामीणों के बयानों के आधार पर जांच शुरू कर दी गई है, और आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है।" हालांकि, वर्मा का यह दावा कि उनकी टीम रात में अन्य कार्यों में व्यस्त थी, ग्रामीणों के गुस्से को शांत करने में नाकाफी रहा।
इस अवैध खनन ने न केवल सरकारी संपदा को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि पर्यावरणीय संकट को भी जन्म दिया है। गहरे गड्ढों के कारण नदी के किनारे कमजोर हो गए हैं, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और पेयजल स्रोतों के सूखने से स्थानीय समुदाय भविष्य में गंभीर समस्याओं का सामना कर सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि माफिया के इस दुस्साहस के पीछे कुछ प्रभावशाली लोगों का समर्थन है, जिसके चलते प्रशासन कार्रवाई करने में हिचक रहा है।
खनन विभाग के अधिकारियों ने भले ही अब कार्रवाई शुरू करने का दावा किया हो, लेकिन ग्रामीणों का विश्वास प्रशासन पर से उठता जा रहा है। कुलदीप शर्मा ने चेतावनी दी, "अगर जल्द ही इस माफिया पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो हम मजबूरन सड़कों पर उतरेंगे। हमारी जमीन, हमारा पर्यावरण और हमारी आने वाली पीढ़ियां खतरे में हैं।"
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर खनन माफिया को इतनी छूट कैसे मिल रही है? क्या प्रशासन की निष्क्रियता माफिया को और बढ़ावा दे रही है? ग्रामीणों की मांग है कि सरकार और प्रशासन तत्काल इस अवैध खनन को रोकें, दोषियों पर सख्त कार्रवाई करें और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं।
अब सबकी नजरें खनन विभाग, पुलिस और स्थानीय प्रशासन पर टिकी हैं। देखना होगा कि कब तक इस माफिया पर लगाम लगेगी और कब ग्रामीणों को इस पर्यावरणीय और आर्थिक लूट से निजात मिलेगी। क्या सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाएगी, या यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? समय ही इस सवाल का जवाब देगा।


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