अल्मोड़ा। अल्मोड़ा शहर में बढ़ती बंदरों की तादाद अब एक गंभीर समस्या बन चुकी है। आसपास के गांवों से लाकर छोड़े गए बंदर न सिर्फ वन्यजीव चुनौती बन रहे हैं, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा और मानसिक शांति के लिए खतरा बन गए हैं। इस मुद्दे को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे ने प्रभारी जिलाधिकारी देवेश शासनि से मुलाकात की और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। इस दौरान रामशिला वार्ड के पार्षद नवीन चंद्र आर्य (बबलू भाई) भी उनके साथ मौजूद रहे।
संजय पाण्डे ने कड़े शब्दों में कहा, "अल्मोड़ा अब शहर नहीं, बल्कि संघर्ष का क्षेत्र बन गया है। बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं, बुजुर्ग घर से बाहर निकलने में हिचकते हैं, और महिलाएं मंदिर जाते वक्त छतों पर बंदरों का डर देखती हैं। यह सुनियोजित जैविक अतिक्रमण है।" उन्होंने प्रशासन से सवाल किए कि बंदरों को ट्रकों में भरकर पहाड़ों में कौन छोड़ रहा है, क्या यह जानबूझकर किया जा रहा है, और अगर किसी बच्चे या बुजुर्ग की जान चली गई तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सात दिनों में ठोस कदम नहीं उठे, तो यह मामला राज्यपाल, मुख्यमंत्री, हाई कोर्ट, मानवाधिकार आयोग और मीडिया तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा, "यह अल्मोड़ा की आत्मा की पुकार है। चुप रहना अब अपराध है।"
पार्षद नवीन चंद्र आर्य ने भी चिंता जताते हुए कहा, "यह समस्या किसी एक वार्ड की नहीं, पूरे शहर की आपात स्थिति है। प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, वरना हालात बेकाबू हो जाएंगे।"
संजय ने पांच मांगें रखीं:
इस संकट की जांच के लिए विशेष समिति बनाई जाए।
नगर निगम, वन विभाग, पुलिस और प्रशासन मिलकर बंदरों को पकड़ने का अभियान चलाएं।
सीमावर्ती इलाकों में स्थायी निगरानी चौकियां बनें।
वन विभाग अपनी प्रगति रिपोर्ट जिलाधिकारी कार्यालय में जमा करे।
पुरानी शिकायतों की दोबारा जांच हो और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।


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