नालागढ़। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद से पिछले तीन वर्षों में बिजली के दामों में लगातार बढ़ोतरी ने उद्योगपतियों के बीच गहरा असंतोष पैदा कर दिया है। उद्योगपतियों का कहना है कि तीन साल पहले जहां एक फैक्ट्री का बिजली बिल 25 लाख रुपये आता था, वहीं अब यह बढ़कर 50 लाख रुपये से अधिक हो गया है। इस बढ़ोतरी से औद्योगिक क्षेत्र बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (बीबीएन) में उद्योगपतियों में खासा रोष देखा जा रहा है। उनका आरोप है कि सरकार उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रही है, जिसके चलते वे पलायन करने को मजबूर हो सकते हैं। उद्योगपतियों ने चेतावनी दी है कि यदि ऐसा हुआ तो राज्य में बेरोजगारी की समस्या गंभीर रूप ले सकती है।
औद्योगिक संगठनों के पदाधिकारियों ने सरकार से बिजली दरों में कटौती की मांग की है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह ठाकुर ने वादा किया था कि हिमाचल में हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ और उत्तराखंड की तुलना में उद्योगपतियों को सस्ती बिजली दी जाएगी और प्रति यूनिट 50 रुपये कम दर पर बिजली उपलब्ध होगी। हालांकि, इसके उलट बिजली के दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं।
लघु उद्योग भारती के प्रदेश अध्यक्ष हरबंस पटियाल ने कहा कि बजट में भी उद्योगपतियों को राहत की उम्मीद थी, लेकिन सरकार ने केवल 66 केवी बिजली का उपयोग करने वाले चुनिंदा बड़े उद्योगों के लिए 40 पैसे प्रति यूनिट की कटौती की, जबकि 90% उद्योगपतियों को कोई लाभ नहीं मिला। उन्होंने बताया कि हरियाणा और पंजाब की तुलना में हिमाचल में बिजली डेढ़ रुपये प्रति यूनिट महंगी है।
वहीं, सिद्धार्था धागा ग्रुप के डायरेक्टर राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल ने कहा कि पिछले छह महीनों में वे मुख्यमंत्री से पांच बार मिल चुके हैं और हर बार सस्ती बिजली का आश्वासन मिला, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि 33 केवी बिजली का उपयोग करने वाले उद्योगों को कोई सब्सिडी नहीं दी गई, जबकि उनका बिल तीन साल पहले 20-25 लाख रुपये से बढ़कर अब 50-60 लाख रुपये प्रतिमाह हो गया है।
अग्रवाल ने चेतावनी दी कि बीबीएन क्षेत्र के 80-90% उद्योग घाटे में चल रहे हैं और यदि सरकार ने बिजली दरों में कटौती नहीं की तो वे अन्य राज्यों में पलायन करने को मजबूर होंगे। उनका कहना है कि हिमाचल में पहले सस्ती बिजली एक आकर्षण थी, लेकिन अब यह भी महंगी हो गई है।
उद्योगपतियों ने सरकार से तत्काल कदम उठाने और बिजली दरों को कम करने की मांग की है, ताकि वे अपने उद्योगों को घाटे से बचा सकें और राज्य में रोजगार के अवसर बरकरार रहें।


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