सोलन। हिमाचल प्रदेश के नौणी स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय में एक दिवसीय क्षेत्रीय प्राकृतिक खेती परामर्श और कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से 500 से अधिक किसान, वैज्ञानिक, नीति निर्माता, कृषि उद्यमी और विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल हुए। यह आयोजन विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन और भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
कार्यशाला का मुख्य लक्ष्य प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाना, क्षमता निर्माण करना और इसकी प्रमाणन प्रक्रिया को आसान बनाना था। ज्ञान-साझाकरण और नीति संवाद के माध्यम से यह आयोजन प्राकृतिक खेती को रसायन-आधारित पारंपरिक खेती के विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक कदम था।
जैव विविधता संरक्षण पर जोर
उद्घाटन सत्र में पद्मश्री विजेता और मंडी जिले के प्रगतिशील किसान नेक राम शर्मा ने प्राकृतिक खेती की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने ‘नौ अनाज’ सिद्धांत को साझा करते हुए कहा कि जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। शर्मा ने युवा किसानों से धैर्य के साथ प्राकृतिक खेती अपनाने और स्थानीय जैव विविधता संरक्षण पर ध्यान देने की अपील की। उन्होंने पर्यावरण के अनुकूल खेती को ग्रह के भविष्य के लिए अनिवार्य बताया।
किसानों की बाजार निर्भरता कम करने की वकालत
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने किसानों की बाजार निर्भरता कम करने पर जोर दिया। उन्होंने स्थानीय संसाधनों से पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने और स्वस्थ उपज को स्थानीय लोगों तक पहुंचाने की बात कही। प्रो. चंदेल ने हिमाचल की ‘सीतारा’ प्रमाणन प्रणाली की सराहना की, जो किसानों को सस्ती और आसान प्रमाणन प्रक्रिया प्रदान करती है। उन्होंने प्राकृतिक खेती के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने के लिए हिमाचल सरकार की भी प्रशंसा की।
समाज को शिक्षित करने की जरूरत
खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त ने रसायन-मुक्त खेती को बढ़ावा देने वाले किसानों को सम्मान देने की बात कही। उन्होंने सरकार से प्राकृतिक खेती के लिए फंडिंग बढ़ाने की मांग की। वहीं, विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. इंद्र देव ने बताया कि कार्यशाला ने हितधारकों को सरकार के प्रयासों को समझने का मंच दिया। विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत राष्ट्रीय केंद्र के रूप में मान्यता मिली है और यह राज्य सरकार व नाबार्ड के सहयोग से चार किसान उत्पादक कंपनियों के साथ काम कर रहा है।
सम्मान और प्रदर्शनी
कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती में योगदान देने वाले किसानों को सम्मानित किया गया। विभिन्न किसान उत्पादक कंपनियों ने प्रदर्शनी लगाकर इसकी सफलता को प्रदर्शित किया।
तकनीकी सत्रों में गहन चर्चा
दो तकनीकी सत्रों में मृदा स्वास्थ्य, कीट प्रबंधन, संसाधन अनुकूलन और लागत प्रभावी तकनीकों पर चर्चा हुई। नीति एकीकरण, बाजार विकास और प्रमाणन प्रणालियों पर भी विचार-विमर्श किया गया। किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए प्राकृतिक खेती के आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों को रेखांकित किया।
इस आयोजन ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सहयोग और संवाद का मंच प्रदान किया, साथ ही इसके विस्तार के लिए राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत पर बल दिया।

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