चैत्र नवरात्र : सुबह 10:09 बजे नहीं हो सका तो 11:48 से 12:38 के बीच करें घट स्थापना - सत्यमेव जयते

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Sunday, March 30, 2025

चैत्र नवरात्र : सुबह 10:09 बजे नहीं हो सका तो 11:48 से 12:38 के बीच करें घट स्थापना



देहरादून। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, रविवार, 30 मार्च 2025 को रेवती नक्षत्र, ऐन्द्र योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के शुभ संयोग में वासंतिक चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी। इसी दिन से हिंदू नववर्ष और विक्रम संवत् 2082 का प्रारंभ होगा। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा की आराधना शुरू होगी।

पंचांग के अनुसार, 30 मार्च को कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। पहला मुहूर्त सुबह 06:02 बजे से 10:09 बजे तक रहेगा। यदि सुबह समय न मिले, तो अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 11:48 बजे से 12:38 बजे तक भी घटस्थापना की जा सकती है। इस बार तिथि क्षय के कारण नवरात्रि नौ की बजाय आठ दिन की होगी। चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि 31 मार्च को सुबह 09:13 बजे शुरू होकर 1 अप्रैल को सुबह 05:42 बजे समाप्त होगी, लेकिन सूर्योदय के समय यह तिथि प्रभावी नहीं रहेगी, जिसके चलते यह क्षय तिथि मानी गई है। इसलिए दुर्गाष्टमी 5 अप्रैल और श्रीराम नवमी 6 अप्रैल को मनाई जाएगी।

देवी भागवत के अनुसार, रविवार से नवरात्रि शुरू होने पर मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं, जो सुख, समृद्धि और शांति का प्रतीक है। इस साल माता अपने भक्तों को वैभव, धन और यश का आशीर्वाद देंगी। इस संवत्सर के राजा और मंत्री दोनों सूर्य हैं।

चैत्र नवरात्रि: कलश स्थापना और पूजा विधि

नवरात्रि के पहले दिन घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाएं और आम के पत्तों का तोरण लगाएं। मान्यता है कि इससे मां दुर्गा और लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में समृद्धि आती है। माता की मूर्ति या तस्वीर को लकड़ी की चौकी पर स्थापित करें। सबसे पहले स्वास्तिक बनाएं, फिर रोली और अक्षत से तिलक करें और मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजा करें।

वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूजा के लिए ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) सबसे उत्तम है। कलश और माता की चौकी इसी दिशा में रखें। एक पीतल का कलश चावल से भरकर मंदिर के उत्तर-पूर्व में रखने से धन-धान्य में वृद्धि होती है। पूजा कक्ष साफ-सुथरा रखें और दीवारों पर हल्के पीले या गुलाबी जैसे आध्यात्मिक रंगों का प्रयोग करें, जो सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाते हैं। काले, नीले या भूरे जैसे तामसिक रंगों से बचें।

शास्त्रों में कलश को सुख, वैभव और मंगल का प्रतीक माना गया है। ईशान कोण जल और ईश्वर का स्थान होने के कारण यहां सकारात्मक ऊर्जा सबसे अधिक होती है। इसलिए कलश और माता की प्रतिमा इसी दिशा में स्थापित करें। मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार लगाने से नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करतीं।

नवरात्रि के दौरान पूरा वातावरण भक्ति से सराबोर रहता है और मां दुर्गा की कृपा से भक्तों के जीवन में समृद्धि और शांति आती है।


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