सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट लाइक करना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट - सत्यमेव जयते

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Sunday, April 20, 2025

सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट लाइक करना अपराध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट


प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट को लाइक करना अपराध नहीं है, लेकिन उसे शेयर या फॉरवर्ड करना अपराध की श्रेणी में आता है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पोस्ट को केवल लाइक करने और उसे साझा करने में स्पष्ट अंतर है। किसी सामग्री को तभी प्रकाशित माना जाएगा, जब उसे शेयर या फॉरवर्ड किया जाए। इसके अलावा, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत केवल अश्लील तस्वीरों या वीडियो के प्रसारण को ही अपराध माना जाता है।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने आगरा निवासी इमरान खान के मामले में सुनवाई के दौरान की। इमरान के खिलाफ मंटोला थाना क्षेत्र में दर्ज एक मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। इमरान पर आरोप था कि उन्होंने फेसबुक पर चौधरी फरहान उस्मान नामक आईडी से साझा एक पोस्ट को लाइक किया था। इस पोस्ट में आगरा कलेक्ट्रेट पर विरोध-प्रदर्शन और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने के लिए लोगों को एकत्रित होने का आह্রीक्षित करें।

पुलिस ने इमरान के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर ट्रायल कोर्ट में आरोपपत्र दाखिल किया था। ट्रायल कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए इमरान को आरोपी के रूप में तलब किया। इसके खिलाफ इमरान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनके वकील ने दलील दी कि इमरान ने अपने फेसबुक अकाउंट से कोई आपत्तिजनक सामग्री साझा नहीं की, जो आईटी एक्ट के तहत अपराध हो। पुलिस ने दावा किया कि इमरान ने अपने फेसबुक से भड़काऊ पोस्ट हटा दी थी, लेकिन व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर ऐसी सामग्री मिली थी।

हाईकोर्ट ने केस डायरी की जांच के बाद पाया कि इमरान ने चौधरी फरहान उस्मान की पोस्ट को केवल लाइक किया था, न कि साझा। इसलिए, कोर्ट ने उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भड़काऊ पोस्ट पर आईटी एक्ट की धारा 67 लागू नहीं होती, क्योंकि यह धारा केवल अश्लील सामग्री से संबंधित है, जिसमें उत्तेजक सामग्री शामिल नहीं है।

इस फैसले ने सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी दिशानिर्देश स्थापित किया है। यह निर्णय सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानूनी सीमाओं के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों में नजीर बन सकता है। साथ ही, यह पुलिस और जांच एजेंसियों को सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में सटीक और कानून के दायरे में कार्रवाई करने की आवश्यकता को भी उजागर करता है।


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