धनखड़ फिर बरसे: संसद सर्वोच्च, जज ‘सुपर संसद’ नहीं बन सकते - सत्यमेव जयते

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Tuesday, April 22, 2025

धनखड़ फिर बरसे: संसद सर्वोच्च, जज ‘सुपर संसद’ नहीं बन सकते


नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक बार फिर न्यायपालिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्रों को लेकर तीखा बयान दिया है। मंगलवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि संविधान की मूल भावना में चुने हुए जनप्रतिनिधि ही "अंतिम स्वामी" हैं और संसद से ऊपर कोई नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्यायपालिका "सुपर संसद" बनने की कोशिश कर रही है, जो असंवैधानिक है।

धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की, जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयक पर तीन महीने में फैसला लेना होगा। उपराष्ट्रपति ने इसे कार्यपालिका के काम में दखल बताते हुए कहा, “राष्ट्रपति को समयबद्ध फैसला लेने का निर्देश देना और न होने पर विधेयक को स्वतः कानून मान लेना संविधान के खिलाफ है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है, और यह हर नागरिक की तरह ही महत्वपूर्ण है।

उपराष्ट्रपति ने 1977 की इमरजेंसी का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जनता ने जवाबदेह बनाया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें इमरजेंसी के दौरान मौलिक अधिकारों के निलंबन को सही ठहराया गया था। धनखड़ ने कहा, “लोकतंत्र की आत्मा नागरिकों में बसती है। संवैधानिक पद सजावटी नहीं, बल्कि देशहित में काम करने वाले हैं।”

उन्होंने आलोचकों पर निशाना साधते हुए कहा कि संवैधानिक पदाधिकारियों के बयान देश के सर्वोच्च हित में होते हैं। धनखड़ ने चेतावनी दी कि जजों को कानून बनाने या सरकार का काम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह बयान न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित करता है, जिस पर राजनीतिक और कानूनी हलकों में बहस तेज हो गई है।


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